Biography

स्वामी विवेकानंद

स्वामी विवेकानंद ने राजयोग और भक्तियोग के माध्यम से मानवता के सेवा में अपना जीवन समर्पित किया। उन्होंने भारतीय समाज में जागरूकता बढ़ाने और राष्ट्र को एक नये ऊँचाईयों तक पहुँचाने के लिए अपने उपदेशों का प्रचार-प्रसार किया।

स्वामी विवेकानंद का योगदान आज भी भारतीय समाज में महत्वपूर्ण है और उनकी विचारशीलता, आध्यात्मिकता, और सेवाभाव के सिद्धांतों ने लोगों को प्रेरित किया है। उनकी शिक्षाएं आज भी योग, ध्यान, और आत्म-निरीक्षण में रुचि रखने वाले लोगों के बीच प्रचलित हैं।

स्वामी विवेकानंद ने राजयोग और भक्तियोग के माध्यम से मानवता के सेवा में अपना जीवन समर्पित किया। उन्होंने भारतीय समाज में जागरूकता बढ़ाने और राष्ट्र को एक नये ऊँचाईयों तक पहुँचाने के लिए अपने उपदेशों का प्रचार-प्रसार किया।

स्वामी विवेकानंद का योगदान आज भी भारतीय समाज में महत्वपूर्ण है और उनकी विचारशीलता, आध्यात्मिकता, और सेवाभाव के सिद्धांतों ने लोगों को प्रेरित किया है। उनकी शिक्षाएं आज भी योग, ध्यान, और आत्म-निरीक्षण में रुचि रखने वाले लोगों के बीच प्रचलित हैं।

स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda) -:

भारतीय संत, योगी, और विचारक थे, जो 19  और 20 सदी के बीच जीवित रहे। उनका जन्म 12 जनवरी  1863  को हुआ था और मृत्यु 4 जुलाई 1902 को हुई थी। स्वामी विवेकानंद ने अपने उद्घाटन भाषण में विश्व धर्म महासभा, 1893 में, शिकागो में अपने उद्घाटन भाषण में भारतीय संस्कृति और योग के महत्व को प्रमोट किया और ‘आपका भारत’ शब्दों से सुरक्षित किया। इस भाषण के बाद उन्हें विश्वभर में एक महान आध्यात्मिक और योगी रूप में पहचाना गया। तीस वर्ष की आयु में स्वामी विवेकानन्द ने शिकागो, अमेरिका के विश्व धर्म सम्मेलन में हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व किया और उसे सार्वभौमिक पहचान दिलवायी। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने एक बार कहा था-“यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानन्द को पढ़िये। उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पायेंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं।

रामकृष्ण मिशन -: 897 में पश्चिमी शिष्यों के एक छोटे समूह के साथ भारत लौटने पर, विवेकानन्द ने कलकत्ता (अब कोलकाता) के पास गंगा नदी पर बेलूर मठ के मठ में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। आत्म-पूर्णता और सेवा उनके आदर्श थे, और आदेश उन पर जोर देता रहा। उन्होंने वेदांतिक धर्म के उच्चतम आदर्शों को अपनाया और उन्हें 20वीं सदी के लिए प्रासंगिक बनाया, और यद्यपि वे उस सदी में केवल दो वर्ष ही जीवित रहे, फिर भी उन्होंने पूर्व और पश्चिम पर समान रूप से अपने व्यक्तित्व की छाप छोड़ी।

सन् 1871 में, आठ साल की उम्र में, नरेन्द्रनाथ ने ईश्वर चंद्र विद्यासागर के मेट्रोपोलिटन संस्थान में दाखिला लिया जहाँ वे स्कूल गए। 1877 में उनका परिवार रायपुर चला गया। 1879 में, कलकत्ता में अपने परिवार की वापसी के बाद, वह एकमात्र छात्र थे जिन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज प्रवेश परीक्षा में प्रथम डिवीजन अंक प्राप्त किये।

वे दर्शन, धर्म, इतिहास, सामाजिक विज्ञान, कला और साहित्य सहित विषयों के एक उत्साही पाठक थे।  इनकी वेद, उपनिषद, भगवद् गीता, रामायण, महाभारत और पुराणों के अतिरिक्त अनेक हिन्दू शास्त्रों में गहन रूचि थी। नरेंद्र को भारतीय शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित किया गया था,[ और ये नियमित रूप से शारीरिक व्यायाम में व खेलों में भाग लिया करते थे। नरेंद्र ने पश्चिमी तर्क, पश्चिमी दर्शन और यूरोपीय इतिहास का अध्ययन जनरल असेम्बली इंस्टिटूशन (अब स्कॉटिश चर्च कॉलेज) में किया। 1881 में इन्होंने ललित कला की परीक्षा उत्तीर्ण की, और 1884 में कला स्नातक की डिग्री पूरी कर ली।

नरेन्द्र ने डेविड ह्यूम, इमैनुएल कांट, जोहान गोटलिब फिच, बारूक स्पिनोज़ा, जोर्ज डब्लू एच हेजेल, आर्थर स्कूपइन्हार , ऑगस्ट कॉम्टे, जॉन स्टुअर्ट मिल और चार्ल्स डार्विन के कामों का अध्ययन किया।[ उन्होंने स्पेंसर की किताब एजुकेशन (1860) का बंगाली में अनुवाद किया।  ये हर्बर्ट स्पेंसर के विकासवाद से काफी मोहित थे। पश्चिम दार्शनिकों के अध्यन के साथ ही इन्होंने संस्कृत ग्रंथों और बंगाली साहित्य को भी सीखा।  विलियम हेस्टी (महासभा संस्था के प्रिंसिपल) ने लिखा, “नरेन्द्र वास्तव में एक जीनियस है। मैंने काफी विस्तृत और बड़े इलाकों में यात्रा की है लेकिन उनकी जैसी प्रतिभा वाला का एक भी बालक कहीं नहीं देखा यहाँ तक की जर्मन विश्वविद्यालयों के दार्शनिक छात्रों में भी नहीं।” अनेक बार इन्हें श्रुतिधर( विलक्षण स्मृति वाला एक व्यक्ति) भी कहा गया है

लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित करना -:

एक बार स्वामी विवेकानन्द अपने आश्रम में सो रहे थे। कि तभी एक व्यक्ति उनके पास आया जो कि बहुत दुखी था और आते ही स्वामी विवेकानन्द के चरणों में गिर पड़ा और बोला महाराज मैं अपने जीवन में खूब मेहनत करता हूँ हर काम खूब मन लगाकर भी करता हूँ फिर भी आज तक मैं कभी सफल व्यक्ति नहीं बन पाया। उस व्यक्ति कि बाते सुनकर स्वामी विवेकानंद ने कहा ठीक है। आप मेरे इस पालतू कुत्ते को थोड़ी देर तक घुमाकर लाये तब तक आपके समस्या का समाधान ढूँढ़ता हूँ। इतना कहने के बाद वह व्यक्ति कुत्ते को घुमाने के लिए चला गया। और फिर कुछ समय बीतने के बाद वह व्यक्ति वापस आया। तो स्वामी विवेकानन्द ने उस व्यक्ति से पूछा की यह कुत्ता इतना हाँफ क्यों रहा है। जबकि तुम थोड़े से भी थके हुए नहीं लग रहे हो आखिर ऐसा क्या हुआ ?

इस पर उस व्यक्ति ने कहा कि मैं तो सीधा अपने रास्ते पर चल रहा था जबकि यह कुत्ता इधर उधर रास्ते भर भागता रहा और कुछ भी देखता तो उधर ही दौड़ जाता था. जिसके कारण यह इतना थक गया है । इसपर स्वामी विवेकानन्द ने मुस्कुराते हुए कहा बस यही तुम्हारे प्रश्नों का जवाब है. तुम्हारी सफलता की मंजिल तो तुम्हारे सामने ही होती है. लेकिन तुम अपने मंजिल के बजाय इधर उधर भागते हो जिससे तुम अपने जीवन में कभी सफल नही हो पाए. यह बात सुनकर उस व्यक्ति को समझ में आ गया था। की यदि सफल होना है तो हमे अपने मंजिल पर ध्यान देना चाहिए।

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