दोपहर की कड़कती धूप में

रात के अंधेरे में सुनसान सड़क पर
काँटे भरी  झाड़ियो 
क्यों फेंका  तुमने मुझको | 

क्यों नहीं काँपे हाथ तुम्हारे 
      जब डाला कचरे में मुझको 
क्यों नहीं आए आँखो में आँसू 
      मेरे रोने से 
इतनी निर्दयी कैसे बनी 
मेरी मुस्कान भी रोक नहीं पाई 
क्यों फेंका  तुमने मुझको | 

9 महीने सींचा था 
      तुमने आपने खून से मुझको 
फिर क्यों नहीं लड़ पाई 
इस दुनिया से 
क्यों फेंका  तुमने मुझको | 

इच्छा अपने दिल की चुनना थी 
इस दुनिया की नहीं सुनना थी 
जिसने दर्द दिया था तुमको 
उसका बदला लेती में 
क्यों फेंका तुमने मुझको | 

मेरी पहचान छीन ली तुमने 
अपने दिल का टुकड़ा फेंक दिया 
     “अब में लावारिस कहलाऊंगी “
 “अब में लावारिस कहलाऊंगी “
क्यों फेंका  तुमने मुझको | 

deepakaneriya

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