poem

बहू और बेटी में फर्क

माँ तू भी है , माँ वो भी है 
फिर माँ जैसा प्यार क्यों 
तुझसे नहीं पाती हूँ | 
हर तकलीफ  में साथ देती हूँ 
फिर भी क्यों धुतकारी जाती हूँ | 





फर्क  बना दिया है
समाज ने बहू और बेटी में |
 ताने बेटी को मिले तो गुस्सा आया 
बहू को बात -बात पर ताना मारना ठीक लगा |
बेटी का जींस पहनना अच्छा लगा
बहू का  सूट पहनना भी गलत लगा |
बहू से उम्मीद करते हो  
सारा काम करके ऑफिस जाएं | 
       बेटी के लिए टिफिन बन जाता हैं | 
बेटी की हर गलती नज़र अंदाज होती है 
    बहू की माफ़ी मांगने के बाद भी
 छोटी सी भूल को 
गुनाह बना देते हो |  

बेटी का इंतजार करते हो
खाना खाने के लिए
बहू का इंतजार करते हो बनाने के लिए

बेटी के पैर छूने पर दिल से दुआएं देते हो  | 
बहू के पैर छूने पर, 
आशीर्वाद का हाथ भी नहीं बढ़ाते हो | 
बेटी के घूमने पर खुश होते हो 
        बहू के जाने पर रोक लगाते  हो | 
बेटी की तारीफ करना आसान है 
मुश्किल तो बहू की तारीफ करना है | 
परिवार वो भी ,परिवार ये भी है 
अपने वहाँ भी है अपने ये भी हैं 
फिर भी अपनों  के बीच अकेला क्यों पाती हूँ | 

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