केडी जाधव की कहानी

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भारत में देश के लिए पहला व्यक्तिगत मेडल जीतने वाले केडी जाधव, जो घर गिरवी रखकर पहुंचे हेल्सिंकी और रचा इतिहास

1952 से पहले भारत दुनिया भर में अपनी हॉकी टीम (Indian Hockey Team) के लिए जाना जाता था. लगातार गोल्ड जीत हॉकी टीम ने अपना वर्चस्व कायम किया हुआ था. हालांकि नॉर्मन प्रिचर्ड (Norman Pitchard) के बाद भारत को किसी व्यक्तिगत खेल में लंबे समय तक  मेडल हासिल नहीं हुआ था. आजादी के बाद देश के इस इंतजार को खत्म किया खासाबा दादासाहब जाधव (KD Jadhav) ने.

आजाद भारत के लिए पहला व्यक्तिगत गोल्ड जीतने वाले केडी जाधव का सफर कोल्हापुर के एक कॉलेज से शुरू हुआ जहां उनके रेसलिंग करने के विचार पर ही उन्हें दुत्कार दिया गया था. जाधव का आत्मविश्वास इससे डगमगाया नहीं और उन्होंने अपने आत्मविश्वास और मेहनत के दम पर ओलिंपिक पोडियम तक का सफर तय किया.

कॉलेज में मिला प्रिंसिपल का साथ

1952 के हेल्सिंकी ओलिंपिक खेलों में रेसलर केडी जाधव ने ब्रॉन्ज मेडल जीता. 23 साल के जाधव कोल्हापुर के कॉलेज में पढ़ते थे. वह चाहते थे कि उन्हें कॉलेज के एनुअल स्पोर्ट्स मीट में रेसलिंग में हिस्सा लेना का मौका मिले लेकिन कॉलेज के स्पोर्ट्स कोच राजा राम ने उन्हें मना कर दिया. वह इसके बाद प्रिंसिपल के पास गए जिन्होंने उन्हें इजाजत दी. जाधव के पास खुद को साबित करने का एक ही मौका था और उन्होंने खुद से ताकतवर और अनुभवी रेसलर्स को मात दी.

कोल्हापुर के महाराजा ने की मदद

जाधव ने पहली बार 1948 के लंदन ओलिंपिक खेलों में हिस्सा लिया था. उस समय सरकार की मदद के बगैर ही खिलाड़ियों को खुद ही ओलिंपिक खेलने जाने का इंतजाम करना पड़ता था. पैसों की कमी के कारण जाधव को लग रहा था कि वह अंग्रेजों के देश में तिरंगा लहराने का सपना पूरा नहीं कर सकेंगे. उनके हौसले को देखते हुए कोल्हापुर के महाराजा मदद के लिए आगे आए और उनके लंदन जाने का सारा खर्च उठाया. लंदन में जाधव छठे नंबर पर रहे, लेकिन उनके खेल को विशेषज्ञों ने बेहद सराहा था.

इसके बाद हेल्सिंकी खेलों में भी उनके सामने यही परेशानी थी और इस बार उनकी मदद के लिए सामने आए कॉलेज के प्रिंसिपल. प्रिंसिपल खरिडकर ने अपना घर गिरवी रखकर 7 हजार रुपये जाधव को दिए और उनकी मदद दी. बाद में राज्य सरकार ने भी उन्हें 4000 रुपये दे दिए. तब भी कम पड़ रहे पैसे की पूर्ति जाधव ने अपना घर गिरवी रखकर और कई लोगों से उधार लेकर पूरी की.

जाधव के लिए हेल्सिंकी ओलिंपिक में भी राह आसान नहीं रही थी. उन्होंने सभी को हैरान करते हुए अपने शुरुआती पांच मुकाबले एकतरफा तरीके से अपने नाम कर लिए थे. छठे मुकाबले में वह जापान के शोहाची से हार गए. इसकाे बाद अगला मुकाबला रूस के पहलवान से था. उन्हें ये बाउट शोहाची से मुकाबले के तुरंद बाद ही खेलनी पड़ी. हालांकि नियमों के अनुसार 30 मिनट के अंदर लड़नी पड़ती है. जाधव के साथ कोई भारतीय अधिकारी मौजूद नहीं था और जाधव को बहुत अच्छी अंग्रेजी नहीं आती थी, इसलिए वे अपना पक्ष नहीं रख पाए. नतीजतन थके हुए जाधव मुकाबले में उतरे और हार गए. लेकिन इसके बावजूद वह ब्रॉन्ज मेडल के हकदार बने.

deepakaneriya

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