हुनर से परिपूर्ण , दिमाग से तेज 
कठिनाइयो का सामना करने वाली 
अपने सपनो को पूरा करने वाली 
हिम्मत ना हारने वाली 
ऐसी कई महिलाओं के बारे में सुना होगा 
उसी में से एक पहली महिला ऑफिसर 
  प्रिया झिंगन के बारे में बताना चाहती हूँ 
किस तरह उन्होंने अपने सपने को पूरा किया | 

प्रिया झिंगन: भारतीय सेना की पहली महिला! 
मैं एक फ़ौजी अफसर से शादी नहीं करना
 चाहतीबल्कि मैं खुद एक फ़ौजी
 अफसर बनना चाहती हूँ
ये शब्द उस वीर महिला के हैं,
 जिसने भारतीय सेना की तस्वीर ही बदल डाली.
 किसे पता था कि अपना सपना पूरा करने की
 राह पर निकली एक महिलाआने वाली कई
पीढ़ियों के सपनों का आधार बनेंगी.
आज अगर महिलाएं केवल घर में बच्चों
 की सुरक्षा करने की सोच से आगे बढ़
देश की रक्षा करने का ख्वाब देख सकती हैं,
 तो इसका श्रेय प्रिया झिंगन को ही जाना चाहिए.
ऐसा क्यों आईए जानते हैं
अपनी शरारतों के लिए मशहूर
हिमाचल प्रदेश के शिमला शहर की शांत
वादियों में एक शरारती बच्चे का जन्म हुआ.
 नाम रखा गया प्रिया झिंगन. शरारत ऐसी की
 अनुशासन की लाखों नाकाबंदियो के बीच
 से भी दौड़ लगा जाए.  
एक पुलिस अफसर के घर में कितना अनुशासन होता है,
 इसका अंदाजा तो आप लगा ही सकते हैं.
ऐसा ही दृश्य था प्रिय झिंगन के घर का.
पुलिस अधिकारी के पद पर तैनात उनके
पिताजी की छड़ी भी उनकी शरारतों के
सामने बोनी नज़र आने लगी.
यहाँ तक कि लोरेटो कान्वेंट तारा कोल
स्कूल के सख्त नियम भी प्रिया की चंचलता
को किसी दायरे में नहीं बांध पाए.
घर और स्कूल में उनकी शैतानी के बस तरीके बदल जाते थे.

प्रिया बचपन से ही एक टॉमबॉय थी. उनके व्यवहार
 से लेकर हर तौर तरीके में एक लड़के सी दृढ़ता थी.
 उनका एक छोटा भाई था
जिसके दोस्तों की टोली की वो सरदार थी.
एक लड़कीजो पेड़ों और रस्सियों पर चढ़ सकती है
उसे सरदार मान कर पूरी मंडली खुश थी.
 दूसरी तरफ स्कूल में उन्हें अपनी कक्षा की
95 प्रतिशत परेशानियों का कारण माना जाता था.
उन्हें कक्षा में बाकी सहपाठियों से अलग आगे
 बैठाया जाता था ताकिवह किसी को परेशान न करें
. किन्तुप्रिया को दिया गया यह दंड अध्यापकों के
लिए ही सजा बन जाता था.
एक दफ़ा तोउन्होंने अपने अध्यापक को इतना
 परेशान कर दिया कि अगले दिन ही उनसे उनका
कैप्टन का बैच ही छीन लिया गया. प्रिया भले कितनी
 भी शरारत करती थीलेकिन उन्होंने हर बार अपनी
 गलती को पूरी ईमानदारी से कबूला.
इस घटना के बाद पहचाना अपना सपना
किस्सा नौवी कक्षा का है. बाकियों की तरह प्रिया
 भी अभी नहीं जानती थी कि उन्हें भविष्य में क्या
 बनना है. इसी दौरान उनके स्कूल में एक फंक्शन
 हुआजिसमें उनके राज्य के गवर्नर मुख्य अतिथि
 के तौर पर मौजद थे.
उनके साथ उनका ए.डी.सी भी तैनात था.
 बताते चले की ए.डी.सी. सेना का ही एक बड़ा अधिकारी होता है.
प्रिया के साथ की सभी लड़कियों को तैनात
 ए.डी.सी बहुत ही मनमोहक लगे.
 इसी क्रम में जब सभी लड़कियां कक्षा में
 वापस जाकर कह रही थी किवो एक फौजी अफसर
 से शादी करना चाहती हैतब प्रिया ने कहा कि 
वह खुद एक फौजी अफसर बनेंगी‘.
प्रिया ने उस समय भले ही जाने-अनजाने में यह
शब्द बोल दिए होलेकिन इन्हीं चंद शब्दों ने उनकी
आगे की जिंदगी तय की.
सपने की तरफ बढ़ना था एक चुनौती
स्कूल की पढ़ाई पूरी करप्रिया ने वकालत की पढ़ाई शुरू कर दी.
जब वह अपनी ग्रेजुएशन के तीसरे साल में थी,
 तब उनका दिमाग  अचानक व्याकुल होने लगा.
 उनके सामने सवाल था कि अब आगे क्या…
इससे पहले कि उनके सामने उनका फौजी
 अफसर बनने का सपना धुंधला पड़ताउनकी
किस्मत ने उन्हें पहला इशारा दिया. एक दिन
अख़बार पढ़ते हुए उन्होंने भारतीय सेना के द्वारा
जारी किया गया एक इश्तेहार देखा.
बस चिंता यह थी कि इस इश्तेहार में केवल
पुरुषों की भर्ती की बात लिखी गयी थी.
शुरू से ही पुरुषो के साथ कंधे से कंधा मिला
 कर चलने वाली प्रिया के मन में यह सवाल आया
कि अगर पुरुषों को यह अवसर मिल सकता हैतो उन्हें
क्यों नही! बताते चले कि उस समय फ़ौज में महिलाओ की
 भारती नहीं होती थी. महिलाएं डॉक्टर के तौर पर ज़रूर
नियुक्त की जाती थीलेकिन वह फौजी अफसर नहीं बन सकती थी.
प्रिया ने तुरंत ही चीफ ऑफ़ आर्मी स्टाफ को पत्र लिख डाला.
 उसमे उन्होंने महिलाओं के सेना में न होने से जुड़े
 कई प्रश्न पूछे. इतने बड़े सेना अध्यक्ष से जवाब मिलने
 की उन्हें कोई उम्मीद नहीं थी.
मगर उनकी उम्मीदों को पंख तब लग गएजब महज
तीन हफ्ते बाद ही उन्हें सेना प्रमुख से जवाब मिला.
उसमें लिखा था कि भारतीय सेना इस पर विचार कर रही है
 और कुछ समय में ही महिलाओं की नियुक्ति भी शुरू हो जाएगी.
इंतज़ार ही था एकमात्र विकल्प
एक साल से ज्यादा का समय गुज़र चुका था
लेकिन सेना में महिलाओं की भर्ती से जुडी कोई खबर नहीं आई.
अपने पिता के बहुत कहने पर उन्होंने हाई कोर्ट में प्रशिक्षु के
 तौर पर दाखिला लियालेकिन वह एक वकील नहीं बनना चाहती थी.
एक दिन जब वह अदालत में बैठी थी
तब उनकी नज़र अख़बार में छपे एक इश्तेहार
 पर पड़ी. यह इश्तेहार महिलाओं की सेना में
भारती को लेकर था. उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा.
अब चुनौती थी कि वकालत की पढ़ाई  कर चुकी
 महिलाओं के लिए केवल दो सीट रिक्त थी.









प्रिया अपनी काबिलियत को लेकर इतनी आत्म विश्वासी थी
की अगली ही मिनट वो सोच रही थी कि उनके
साथ भर्ती होने वाली दूसरी महिला कौन होगी.
प्रिया ने परीक्षा के लिए आवेदन डाल दिया.
उन्होंने परीक्षा पास भी कर लीलेकिन अब फिर
से इंतज़ार की घड़ी आ चुकी थी. कई महीनों के
इंतज़ार के बाद आखिर वह दिन आ ही गया,
जब उनका नाम इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज होने वाला था.
लिस्ट में उनका नाम शीर्ष स्थान पर था.
 वह ऑफिसर्स ट्रेनिगं अकादमीचेन्नई  में
 दाखिल होने वाली कैडेट 001 थी. इसी के साथ ही
वह भारतीय सेना में भर्ती होने वाली पहली महिला बनी.

जीत के बाद भी जारी रहा संघर्ष
वह अपने सपने के बहुत नज़दीक पहुँच चुकी थी,
 लेकिन कहते है नजो चीज़ मशक्कत के बाद मिले
उसका मज़ा ही कुछ और होता है.

जब प्रिया ट्रेनिंग के लिए चेन्नई निकली तो रास्ते में अचानक ही

उनके पेट में असहनीय दर्द होने लगा
जिसके बाद उन्हें हस्पताल ले जाना पड़ा.
वहाँ उन्हें बताया गया कि उनके गुर्दे में रिसोली है.
साथ ही उन्हें पता चला कि बीमारी के चलते
उन्हें ट्रेनिंग अकादमी में रेलीगेट कर दिया जाएगा.
 वह बाकी साथियों के साथ ट्रेनिग पूरी नहीं कर पाएगी.
यह सुनते ही वह बिस्तर से कूद पड़ी और गुज़ारिश
कर हस्पताल से छुट्टी ले ली.
अकादमी पहुँचने के अगले ही दिन
 उन्हें 2.5 किलोमीटर की दौड़ लगनी थी.
 उनकी लगन ने रिसोली के दर्द को उन पर हावी नहीं होने दिया
. वह दौड़ में अव्वल दर्जे पर आई.
प्रिया ने मार्च 1993 को अपनी ट्रेनिगं सिल्वर
 मैडल के साथ पूरी की. उन्हें जज एडवोकेट
 जनरल के दफ्तर में तैनात किया गया.
 फ़ौज में जाने वाली पहली महिला के
लिहाज़ से उन्हें कई परेशानियों का सामना करना पड़ा.
जवान बाकी अफसरों को तो सलाम किया करते थे,
लेकिन प्रिय को नहीं. उनके भीतर एक महिला को
अपने सीनियर के रूप में अपनाने की झिझक थी.
इसके अलावा उस समय महिलाओं के लिए अलग से शौचालय नहीं थे.
शुरुआत में प्रिया को इससे भी काफी दिक्कत हुई
लेकिन उन्होंने अपनी सूझ-बूझ से हर परेशानी का हल निकाल लिया.
सर्विस में आए उन्हें कई महीने गुज़र गए.
उन्होंने काफी मुश्किलें भी देखी
लेकिन आखिर वो दिन आ ही गया,
जब उन्हें उनकी पहली ज़िम्मेदारी सौंपी गयी.
उन्हें अपने ज़िन्दगी का पहला कोर्ट मार्शल करना था.
उन्होंने उसे इतने सुचारू रूप से संभाला कि किसी को
आभास भी नहीं हुआ कि वह उनका पहला कोर्ट मार्शल था.

प्रिया झिंगल जैसी महिलाओं के कारण ही
 समाज अब महिलाओं को बराबरी के मौके देने लगा है.
 आज भी वह एक अध्यापक के तौर पर
हज़ारो लोगों को प्रेरणा देती हैं.
सेना में महिलाओं की बढती हिस्सेदारी के हर

 पड़ाव पर प्रिया झिंगन का नाम ज़रूर लिया जाएगा.


deepakaneriya

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